न्याय करने वाले ना बनें


"यदि आप लोगों का न्याय करते है, तो आप के पास उनसे प्रेम करने का समय नहीं है।" -मदर टेरेसा


हे भाइयो, एक दूसरे की बदनामी न करो, जो अपने भाई की बदनामी करता है, या भाई पर दोष लगाता है, वह व्यवस्था की बदनामी करता है, और व्यवस्था पर दोष लगाता है। और यदि तू व्यवस्था पर दोष लगाता है, तो तु व्यवस्था पर चलने वाला नहीं, पर उस पर हाकिम ठहरा। -याकूब 4:11


जब हम किसी का न्याय करते है, तब हम उन पर दोष लगाते है, और ऐसा करने का अधिकार केवल परमेश्वर को है। मैंने एक परिभाषा सुनी है कि, न्याय करने का अर्थ है, स्वयं को परमेश्वर के स्थान पर रखना। मुझे नहीं लगता कि हम में से कोई भी परमेश्वर का काम करना चाहेगा, क्या ऐसा चाहेगा। किसी स्थिति या व्यक्ति की ओर एक नज़र डालकर वास्तविक परिस्थिति ना जानते हुए अपना न्याय प्रगट करना आसान है। परमेश्वर केवल यही नहीं जानता है कि कोई एक व्यक्ति क्या कर रहा है, परंतु वह यह भी जानता है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। हम शरीर के स्वभाव के अनुसार न्याय करते है, परंतु परमेश्वर हृदय के अनुसार न्याय करता है।


व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री को पथरवाह करने वाली भीड़ से यीशु ने कहा कि उनमें से जिसने कभी कोई पाप ना किया हो वह पहला पत्थर मारे। वह क्या कहना चाहता है, उस पर कुछ क्षण विचार करने के बाद उन्होंने अपने हाथों से पत्थर नीचे डाल दिए और वहाँ से एक एक करके चले गए। हम में से कौन कह सकता है कि हम में पाप नहीं है। तो फिर हम दूसरों की गलती के लिए उनका न्याय करने में जल्दबाज़ी क्यों करते है। हम पाप का न्याय कर सकते है, परंतु हम किसी के हृदय का न्याय नहीं कर सकते। हम परमेश्वर के वचन का जितना अधिक अध्ययन करते है, तब हमें उतनी शिघ्रता से कोई भी गलत बात का ज्ञान होगा, परंतु उस कारण हमें दूसरों को जो करना चाहिए वह वो नहीं करते इसलिए उनका न्याय करने की आदत को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। एक बार फिर, हमें परमेश्वर के वचन के अनुसार चलना चाहिए और "तत्पर तथा प्रार्थना में रहना" चाहिए। हमें तत्पर रहकर न्याय नहीं करना चाहिए, परंतु तत्पर रहकर प्रार्थना करनी चाहिए। दूसरों से आपके साथ जैसे व्यवहार की आप अपेक्षा करते है उसी प्रकार आप उनसे व्यवहार करें, और देखें जीवन कितना मधुर बन जाता है।


जब भी हम न्याय करते है, चाहे वह अच्छे के लिए या बुरे के लिए क्यों ना हो, हम एक बीज बोते हैं, जो हमारे अपने जीवन में फल उत्पन्न करता है। यदि हम आलोचक तथा निर्दयी है, तो उसी प्रकार हमारा भी न्याय होगा, परंतु यदि हम दया देते है, तो हम भी दया की फसल काटेंगे। हम में दूसरों से प्रेम करने की क्षमता है और हमें ऐसा करना चाहिए क्योंकि यही एक आज्ञा यीशु ने हमारे लिए रख छोड़ी है। उसने कहा, "जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो।" (देखिए यूहन्ना 13:34, और देखिए यूहन्ना 15:12) न्याय करने में तत्पर होना यह घमंटी होने का एक और लक्षण है, और पवित्र शास्त्र हमें सिखाता है कि नाश होने से पहले घमंड आता है, परंतु नम्रता के बाद सम्मान होता है (देखिए नीतिवचन 18:12)। यदि हम परेशानी चाहते है, तो हम न्यायी बने रह सकते है। परंतु यदि हमें सम्मान चाहिए तो हम नम्रता धारण कर सकते है। निर्णय हमारा है।

Copyright © 2016 | FAQ | Contact Us